कोटा में निलंबित 3 डॉक्टर 5 महीने बाद बहाल: 4 जांच कमेटियों ने किसी को नहीं माना दोषी; 13 दिन में 5 प्रसूताओं की हुई थी मौत
कोटा: राजस्थान के कोटा में प्रसूताओं की मौत के मामले में करीब पांच महीने से निलंबित चल रहे तीन डॉक्टरों को अब बहाल कर दिया गया है। मामले की जांच के लिए गठित अलग-अलग उच्चस्तरीय कमेटियों की रिपोर्ट के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने तीनों डॉक्टरों का निलंबन रद्द कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, कोटा, जयपुर, जोधपुर और दिल्ली स्तर पर हुई जांचों में इन तीन डॉक्टरों को मौतों के लिए दोषी नहीं माना गया।
यह वही मामला है जिसमें मई 2026 में कोटा के सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी के बाद महज 13 दिनों के भीतर पांच प्रसूताओं की मौत हो गई थी। लगातार मौतों के बाद अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था, इलाज की प्रक्रिया, दवाओं और मेडिकल प्रोटोकॉल को लेकर कई सवाल उठे थे।
9 मई को तीन डॉक्टर किए गए थे निलंबित
रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान सरकार ने 9 मई 2026 को गायनी विभाग के प्रोफेसर डॉ. बीएल पाटीदार, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. खुशबू और सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नवनीत कुमार को निलंबित किया था।
निलंबन के पीछे शुरुआती जांच में सामने आए सवाल और अस्पताल में प्रसूताओं के इलाज से जुड़ी परिस्थितियां प्रमुख थीं। उस समय प्रशासन की ओर से पूरे मामले की विस्तृत जांच के आदेश दिए गए थे।
शुरुआती दौर में अलग-अलग स्तर पर जांच शुरू हुई और विशेषज्ञों से भी मामले की समीक्षा कराई गई। बाद में कई समितियों की रिपोर्ट के आधार पर पूरे मामले का व्यापक मूल्यांकन किया गया।
13 दिन में 5 प्रसूताओं की हुई थी मौत
मई 2026 में कोटा में प्रसूताओं की मौतों का सिलसिला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया था। रिपोर्टों के अनुसार 5 मई से 17 मई के बीच पांच प्रसूताओं की मौत हुई।
इन महिलाओं में पायल, ज्योति, प्रिया, पिंकी और शिरिन के नाम रिपोर्टों में सामने आए। सभी मामलों में सिजेरियन डिलीवरी के बाद स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जटिलताएं सामने आई थीं।
घटनाओं के बाद यह सवाल उठा कि आखिर अलग-अलग महिलाओं की तबीयत अचानक क्यों बिगड़ी और मौतों के पीछे वास्तविक कारण क्या थे। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया।
चार कमेटियों ने की मामले की जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए अलग-अलग स्तरों पर विशेषज्ञ समितियों से जांच कराई गई। रिपोर्टों में कोटा, जयपुर, जोधपुर और दिल्ली से जुड़ी उच्चस्तरीय जांच का उल्लेख है।
जांच में प्रसूताओं की मेडिकल हिस्ट्री, इलाज की प्रक्रिया, ऑपरेशन के बाद की निगरानी, दवाओं और अस्पताल में अपनाए गए मेडिकल प्रोटोकॉल जैसे पहलुओं को देखा गया।
जून में भी जांच रिपोर्टों को लेकर जानकारी सामने आई थी। उस समय सरकार को विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट सौंपे जाने की बात सामने आई थी और अंतिम निष्कर्ष से पहले वरिष्ठ विशेषज्ञों से समीक्षा कराए जाने की जानकारी दी गई थी।
मौतों के कारण अलग-अलग बताए गए
जांच के दौरान पांचों प्रसूताओं की मौत को एक ही कारण से जोड़ने के बजाय अलग-अलग मेडिकल परिस्थितियों पर विचार किया गया। रिपोर्टों में पल्मोनरी एम्बोलिज्म, कार्डियक समस्या, प्रसव के बाद अधिक रक्तस्राव और अन्य गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं जैसे कारणों का उल्लेख हुआ था।
इस दौरान ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठे थे। बाद की रिपोर्टों में विशेषज्ञ जांच के आधार पर ऑक्सीटोसिन को पांच मौतों का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना गया और मौतों के पीछे अलग-अलग मेडिकल परिस्थितियों तथा उपचार संबंधी पहलुओं की जांच की गई।
शुरुआती जांच में लापरवाही के सवाल उठे थे
घटना के शुरुआती दिनों में अस्पताल की व्यवस्था और मेडिकल प्रोटोकॉल को लेकर गंभीर सवाल सामने आए थे। एक रिपोर्ट में बताया गया था कि जांच के दौरान मरीजों की निगरानी, उपचार रिकॉर्ड और प्रोटोकॉल के पालन से जुड़े कुछ पहलुओं पर सवाल उठे थे।
इसी शुरुआती जांच के बाद कुछ मेडिकल कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई थी। हालांकि बाद की उच्चस्तरीय जांचों में तीन निलंबित डॉक्टरों को इन मौतों के लिए दोषी नहीं माना गया।
यानी मामले में शुरुआती प्रशासनिक कार्रवाई और बाद की विशेषज्ञ जांच के निष्कर्षों में अंतर दिखाई देता है। डॉक्टरों की बहाली इसी विस्तृत जांच प्रक्रिया के बाद हुई है।
पांच महीने बाद मिली बड़ी राहत
अब चार जांच कमेटियों की रिपोर्ट के बाद डॉ. बीएल पाटीदार, डॉ. खुशबू और डॉ. नवनीत कुमार का निलंबन रद्द कर दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार तीनों डॉक्टरों को दोबारा कोटा मेडिकल कॉलेज में पदस्थापित किया गया है।
इस फैसले का मतलब यह है कि उपलब्ध उच्चस्तरीय जांच रिपोर्टों में इन तीन डॉक्टरों के खिलाफ ऐसा निष्कर्ष नहीं निकला, जिसके आधार पर उनका निलंबन जारी रखा जाए।
हालांकि, यह मामला केवल तीन डॉक्टरों की बहाली तक सीमित नहीं है। पांच प्रसूताओं की मौत के पूरे घटनाक्रम में इलाज की प्रक्रिया, मेडिकल प्रोटोकॉल और अस्पताल व्यवस्था से जुड़े सवालों पर अलग-अलग स्तर पर चर्चा और जांच हुई है।
दवाओं को लेकर भी उठे थे सवाल
मामले की जांच के दौरान ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के एक बैच को लेकर भी सवाल सामने आए थे। कुछ रिपोर्टों में दवा के सैंपल की गुणवत्ता को लेकर जांच की जानकारी दी गई थी। बाद में विशेषज्ञों की रिपोर्ट में मौतों को केवल इसी दवा से जोड़ने के बजाय अलग-अलग चिकित्सकीय कारणों और उपचार संबंधी पहलुओं को देखा गया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि शुरुआती आशंका और अंतिम जांच निष्कर्ष एक जैसे होना जरूरी नहीं है। किसी मेडिकल घटना में अंतिम निष्कर्ष विशेषज्ञ जांच, मेडिकल रिकॉर्ड और उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर तय होता है।
कोटा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे थे सवाल
पांच प्रसूताओं की मौत के बाद कोटा के सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को लेकर प्रदेशभर में चर्चा हुई थी। मरीजों की निगरानी, सर्जरी के बाद की देखभाल और गंभीर स्थिति में समय पर उपचार जैसे मुद्दे जांच के केंद्र में रहे।
मामले के दौरान प्रशासन ने भी जांच के आदेश दिए थे। शुरुआती रिपोर्टों में जिला प्रशासन और अस्पताल प्रशासन की ओर से जांच को लेकर अलग-अलग बातें सामने आई थीं।
ऐसे मामलों में मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड और विशेषज्ञों की राय महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि केवल एक घटना या शुरुआती अनुमान के आधार पर अंतिम जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
डॉक्टरों की बहाली के बाद अब आगे क्या?
तीनों डॉक्टरों की बहाली के बाद अब इस मामले में जांच से जुड़े निष्कर्षों और विभागीय कार्रवाई पर नजर रहेगी। उच्चस्तरीय समितियों ने तीनों डॉक्टरों को दोषी नहीं माना है, जिसके आधार पर उनका निलंबन खत्म किया गया।
वहीं पांच प्रसूताओं की मौत का पूरा घटनाक्रम स्वास्थ्य विभाग के लिए भी महत्वपूर्ण मामला रहा है। जांच में सामने आए मेडिकल और प्रशासनिक पहलुओं के आधार पर अस्पतालों में भविष्य में उपचार व्यवस्था और प्रोटोकॉल को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा सकता है।
राजस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों से जुड़ी अन्य खबरों के लिए Bulletino की राजस्थान न्यूज कवरेज पढ़ सकते हैं। इसी तरह डॉक्टर और अस्पताल से जुड़ी एक अन्य खबर में जोधपुर AIIMS में रेजिडेंट डॉक्टर की मौत का मामला भी सामने आया था।
फिलहाल कोटा के इस मामले में सबसे बड़ा अपडेट यही है कि मई में निलंबित किए गए तीन डॉक्टरों को पांच महीने बाद बहाल कर दिया गया है। चार उच्चस्तरीय जांच कमेटियों की रिपोर्ट में उन्हें पांच प्रसूताओं की मौत के लिए दोषी नहीं माना गया।
