गांधी ने मांस खाया, वेश्यालय गए, आत्महत्या की कोशिश: बापू की जवानी के किस्से, जो उन्होंने खुद लिखे; कैसे थे ‘जेन-जी महात्मा गांधी’
महात्मा गांधी को आज दुनिया अहिंसा, सत्य और सादगी के प्रतीक के रूप में जानती है। लेकिन गांधी बनने से पहले मोहनदास करमचंद गांधी भी एक सामान्य किशोर और युवा थे, जिनके जीवन में जिज्ञासा, डर, आकर्षण, गलतियां, अपराधबोध और खुद को बदलने की कोशिशें शामिल थीं।
इनमें से कई बातें खुद गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ’ यानी ‘सत्य के प्रयोग’ में लिखीं। उन्होंने अपनी जिंदगी को किसी आदर्श व्यक्ति की चमकदार कहानी के रूप में पेश करने के बजाय अपने प्रयोगों, कमजोरियों और गलतियों को भी दर्ज किया। गांधी ने भूमिका में लिखा कि उनका उद्देश्य अपने जीवन के जरिए सत्य के साथ किए गए प्रयोगों को सामने रखना था।
आज की भाषा में कहें तो गांधी की जवानी की कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जिन्हें पढ़कर लगता है कि वह भी कभी उन सवालों और उलझनों से गुजर रहे थे, जिनसे युवा गुजरते हैं। फर्क यह था कि उन्होंने बाद में अपनी गलतियों को छिपाने के बजाय उन्हें सार्वजनिक रूप से लिख दिया।
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13 साल की उम्र में हो गई थी शादी
गांधी ने अपनी आत्मकथा में अपनी शादी का जिक्र भी बेहद स्पष्टता से किया है। उन्होंने बताया कि उनका विवाह करीब 13 साल की उम्र में कस्तूरबा से हुआ था। उस समय बाल विवाह सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा था, लेकिन बड़े होकर गांधी ने खुद अपने इस विवाह को उचित नहीं माना।
उन्होंने लिखा कि उस उम्र के बच्चों को देखकर उन्हें अपने बचपन का विवाह याद आता था और वह मानते थे कि इतनी कम उम्र में शादी नहीं होनी चाहिए थी।
गांधी के लिए यह सिर्फ शादी की घटना नहीं थी। वह आगे लिखते हैं कि उस समय उनमें पति के अधिकार और वैवाहिक आकर्षण को लेकर भी भावनाएं थीं। बाद के वर्षों में उन्होंने अपने किशोर जीवन को पीछे मुड़कर देखा और अपनी इच्छाओं तथा व्यवहार की आलोचनात्मक समीक्षा की।
यही आत्ममंथन उनकी आत्मकथा की खास बात है।
ताकतवर बनने की चाह में खाया था मांस
गांधी का परिवार वैष्णव परंपरा से जुड़ा था और उनके माता-पिता मांसाहार के विरोधी थे। इसके बावजूद किशोर गांधी ने एक मित्र के प्रभाव में मांस खाने का प्रयोग किया।
गांधी ने लिखा कि उनके मित्र का मानना था कि अंग्रेज भारतीयों पर इसलिए शासन कर पा रहे हैं क्योंकि वे मांस खाते हैं और इससे वे ज्यादा मजबूत और साहसी होते हैं। गांधी उस समय शारीरिक रूप से खुद को कमजोर महसूस करते थे। इसलिए उनके मन में आया कि अगर वह मांस खाएंगे तो शरीर मजबूत होगा और शायद देश भी अंग्रेजों का मुकाबला करने में सक्षम बनेगा।
इस प्रयोग की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ मांस खाना नहीं थी। गांधी जानते थे कि अगर उनके माता-पिता को इसकी जानकारी हुई तो उन्हें बहुत दुख होगा। इसलिए उन्होंने यह बात उनसे छिपाई।
बाद में गांधी ने महसूस किया कि माता-पिता से बात छिपाना उनके सत्य के सिद्धांत से मेल नहीं खाता। इसी कारण उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया।
यानी गांधी की कहानी में मांस खाने का प्रसंग किसी खान-पान की सलाह से ज्यादा गलती, उसके पीछे की सोच और फिर उससे बाहर निकलने की प्रक्रिया के रूप में सामने आता है।
दोस्त उन्हें वेश्यालय तक ले गया
गांधी की आत्मकथा का एक और चर्चित प्रसंग वेश्यालय जाने से जुड़ा है।
गांधी ने बताया कि जिस मित्र के प्रभाव में उन्होंने मांस खाना शुरू किया था, वही एक बार उन्हें वेश्यालय ले गया। गांधी के अनुसार वहां जाने की पूरी व्यवस्था पहले से की गई थी। उन्हें अंदर भेज दिया गया।
लेकिन वहां पहुंचने के बाद गांधी बेहद असहज हो गए। उन्होंने लिखा कि वह महिला के पास बैठ तो गए, लेकिन बोल नहीं पाए। वह इतने संकोच में थे कि बातचीत तक नहीं कर सके। आखिरकार महिला ने उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया।
गांधी ने बाद में इस घटना को अपने लिए एक चेतावनी के रूप में देखा। उन्होंने माना कि वह गलत दिशा में जा सकते थे, लेकिन उस समय उनका संकोच और परिस्थिति उन्हें आगे बढ़ने से रोक गई।
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गांधी ने इसे भी अपनी आत्मकथा से हटाया नहीं। उन्होंने अपने पाठकों को अपने जीवन का ऐसा हिस्सा बताया जिसे कोई व्यक्ति सामान्यतः छिपाना पसंद कर सकता है।
सिगरेट के लिए चोरी तक की
किशोर गांधी के जीवन में धूम्रपान का प्रयोग भी आया।
आत्मकथा में गांधी बताते हैं कि उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को सिगरेट पीते देखा। उन्हें भी सिगरेट पीने की इच्छा हुई, लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे। शुरुआत में वे फेंके हुए सिगरेट के टुकड़े उठाकर पीने लगे।
बाद में सिगरेट खरीदने के लिए उन्होंने घर के नौकर के पैसों में से छोटी रकम चुराई।
यह आदत ज्यादा दिनों तक नहीं चली। धूम्रपान को लेकर उनकी बेचैनी और घरवालों से छिपाने की मजबूरी ने स्थिति को और मुश्किल बनाया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
स्वतंत्रता न मिलने की झुंझलाहट में आत्महत्या का विचार
सिगरेट और चोरी की आदत के साथ गांधी के मन में एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि वह अपनी जिंदगी में स्वतंत्र नहीं हैं।
उन्होंने और उनके एक रिश्तेदार ने आत्महत्या करने का विचार किया। दोनों ने धतूरे के बीजों को जहर मानकर उन्हें हासिल किया और मंदिर में जाने के बाद आत्महत्या करने का प्रयास करने की सोची।
लेकिन जब वास्तविक रूप से जान देने की बारी आई तो दोनों डर गए। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि उन्होंने कुछ बीज निगलने की कोशिश की, लेकिन ज्यादा लेने का साहस नहीं हुआ। इसके बाद दोनों ने आत्महत्या का विचार छोड़ दिया।
गांधी ने इस घटना से एक महत्वपूर्ण बात सीखी—आत्महत्या के बारे में सोचना और वास्तव में मौत का सामना करना दो अलग चीजें हैं।
इस घटना के बाद उन्होंने धूम्रपान और चोरी की आदत छोड़ने का फैसला किया।
यहां यह भी समझना जरूरी है कि यह घटना गांधी के किशोर जीवन की एक ऐतिहासिक आत्मकथात्मक घटना है। इसे आज के समय में आत्महत्या के तरीके या सलाह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भाई का कर्ज चुकाने के लिए सोना चुराया
गांधी ने अपनी आत्मकथा में एक और चोरी का जिक्र किया है।
उनके भाई पर करीब 25 रुपये का कर्ज था। भाई के हाथ में सोने का कड़ा था। गांधी ने उसमें से थोड़ा सोना काट लिया और उससे भाई का कर्ज चुकाने में मदद की।
लेकिन चोरी के बाद गांधी के मन में अपराधबोध पैदा हुआ। उन्हें लगा कि उन्होंने गलत किया है।
आखिरकार उन्होंने अपने पिता को पूरी घटना लिखकर बताने का फैसला किया।
उन्होंने एक कागज पर अपनी गलती स्वीकार की और पिता से माफी मांगी। साथ ही भविष्य में चोरी न करने का वादा किया।
गांधी के अनुसार उनके पिता ने उस पत्र को पढ़ा और उनकी आंखों से आंसू निकल आए। उन्होंने गांधी को दंड देने के बजाय अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें गहरे स्तर पर प्रभावित किया।
गांधी ने बाद में इस घटना को अपने जीवन में अहिंसा और प्रेम से जुड़े महत्वपूर्ण अनुभवों में माना।
पिता की मृत्यु के समय भी खुद को दोषी मानते थे
गांधी की जवानी का सबसे भावनात्मक प्रसंग उनके पिता की मृत्यु से जुड़ा है।
जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार थे, तब गांधी उनकी सेवा करते थे। वह उनके पैरों की मालिश करते और उनकी देखभाल करते थे। लेकिन उसी समय गांधी की पत्नी गर्भवती थीं और गांधी खुद लिखते हैं कि उनकी कामेच्छा ने उन्हें पिता की सेवा से हटाकर पत्नी के पास जाने के लिए प्रेरित किया।
एक रात वह अपने पिता की सेवा से हटकर पत्नी के कमरे में चले गए। कुछ ही देर बाद उन्हें खबर मिली कि उनके पिता का निधन हो गया।
इस घटना का गांधी पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें जीवनभर इसका अपराधबोध रहा कि अगर वह उस समय पिता के पास होते तो शायद उनके अंतिम क्षणों में सेवा कर पाते।
यह प्रसंग बताता है कि गांधी अपने अतीत को केवल उपलब्धियों के नजरिए से नहीं देखते थे। वह अपनी इच्छाओं, कमजोरियों और उन फैसलों को भी याद करते थे जिन्हें लेकर उन्हें बाद में पछतावा हुआ।
तो क्या गांधी ‘जेन-जी’ जैसे थे?
गांधी को आज की पीढ़ी के संदर्भ में ‘जेन-जी महात्मा गांधी’ कहना एक आधुनिक तुलना हो सकती है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह शब्द उनके समय के लिए लागू नहीं होता।
फिर भी उनकी जवानी की घटनाओं में कुछ ऐसी बातें जरूर हैं जो आज के युवाओं को परिचित लग सकती हैं—दोस्तों का प्रभाव, कुछ नया आजमाने की इच्छा, खुद को दूसरों से कमजोर समझना, गलत फैसले लेना, सामाजिक दबाव, रिश्तों की उलझन और फिर अपने फैसलों पर सवाल उठाना।
लेकिन गांधी की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद उनकी गलतियां नहीं, बल्कि गलतियों को स्वीकार करने की उनकी आदत है।
उन्होंने अपनी आत्मकथा की शुरुआत ही इस विचार से की कि वह अपनी जिंदगी के सत्य और प्रयोगों को सामने रखना चाहते हैं। उन्होंने खुद को पूर्ण या अचूक व्यक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश नहीं की। बल्कि वह लगातार अपने व्यवहार की जांच करते रहे।
गांधी की जवानी हमें क्या बताती है?
गांधी के इन प्रसंगों को पढ़ते समय दो अतियों से बचना जरूरी है।
पहली, उन्हें केवल उनकी गलतियों के आधार पर देखना। दूसरी, उन्हें इतना आदर्श मान लेना कि उनके जीवन की मानवीय कमजोरियों को स्वीकार ही न किया जाए।
गांधी की आत्मकथा का बड़ा हिस्सा इसी आत्मनिरीक्षण पर आधारित है। मांस खाने से लेकर धूम्रपान, चोरी, वेश्यालय जाने की घटना और आत्महत्या के विचार तक—उन्होंने अपने अतीत को छिपाने के बजाय उसे अपने आत्म-सुधार की कहानी का हिस्सा बनाया।
उनकी जिंदगी का यह पक्ष यह भी दिखाता है कि किसी व्यक्ति का पूरा व्यक्तित्व उसकी किशोरावस्था की गलतियों से तय नहीं होता। इंसान अपने अनुभवों से सीख सकता है, अपने व्यवहार को बदल सकता है और अपने लिए नए सिद्धांत बना सकता है।
शायद इसी वजह से गांधी की आत्मकथा का नाम ‘सत्य के प्रयोग’ रखा गया। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी नहीं है जो जन्म से ही हर मामले में आदर्श था। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने अपने जीवन की घटनाओं को देखा, उनसे सवाल किए और कई बार अपनी ही गलतियों को कठघरे में खड़ा किया।
आज जब सोशल मीडिया के दौर में लोग अपनी जिंदगी का सिर्फ चमकदार हिस्सा दिखाना पसंद करते हैं, गांधी की आत्मकथा का यह पक्ष अलग तरह से सामने आता है—उन्होंने अपनी छवि बचाने के बजाय अपने अतीत के कठिन अध्यायों को भी लिख दिया।
और यही वजह है कि गांधी की जवानी के ये किस्से आज भी चर्चा में आते हैं।
ध्यान देने वाली बात: मांस खाने, वेश्यालय जाने, धूम्रपान, चोरी और आत्महत्या के प्रयास से जुड़े ये विवरण गांधी की अपनी आत्मकथा में दर्ज हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आधुनिक घटनाओं की रिपोर्ट की तरह नहीं, बल्कि गांधी द्वारा अपने जीवन के बारे में किए गए आत्मकथात्मक वर्णन के रूप में पढ़ना चाहिए। गांधी की आत्मकथा का पहला भाग 1927 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था और मूल गुजराती धारावाहिक रूप में 1925 से प्रकाशित होना शुरू हुआ था।
