
आज का एक्सप्लेनर: मुस्कान-साहिल को फांसी की सजा सुनाकर जज ने पेन क्यों फेंका? जानिए ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ का मतलब
मेरठ के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद एक सवाल लगातार चर्चा में है—फैसला लिखने के बाद जज ने अपना पेन क्यों फेंक दिया? क्या यह अदालत की कोई परंपरा है? आखिर इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी दुर्लभतम से दुर्लभ मामला क्यों माना गया और क्या दोनों को वास्तव में फांसी होगी?
इन सवालों को समझने के लिए मामले की पृष्ठभूमि, अदालत की सजा देने की कसौटी और भारत में मृत्युदंड की कानूनी प्रक्रिया को जानना जरूरी है।
मुस्कान और साहिल को किस मामले में मिली मौत की सजा?
यह मामला उत्तर प्रदेश के मेरठ में मर्चेंट नेवी अधिकारी सौरभ राजपूत की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 3 मार्च 2025 को सौरभ की हत्या की गई थी। इसके बाद उनके शव के टुकड़े करके एक नीले ड्रम में रखा गया और उसे सीमेंट से बंद कर दिया गया, ताकि अपराध छिपाया जा सके।
यह मामला सामने आने के बाद देशभर में चर्चा का विषय बन गया। पुलिस जांच और मुकदमे की सुनवाई के बाद अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया। 14 अक्टूबर 2026 को मेरठ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने दोनों को मौत की सजा सुनाई।
रिपोर्टों के मुताबिक, मुकदमे की सुनवाई लगभग 13 महीने चली और इस दौरान 126 सुनवाइयां हुईं। अभियोजन पक्ष ने 22 गवाह पेश किए। अदालत ने अपराध की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मृत्युदंड का फैसला दिया।
जज ने फैसला सुनाने के बाद पेन क्यों फेंका?
मौत की सजा सुनाने के बाद जज द्वारा इस्तेमाल किया गया पेन फेंकने की घटना ने लोगों का ध्यान खींचा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह कदम फैसले की गंभीरता और उसके असाधारण स्वरूप को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने वाली न्यायिक परंपरा के तौर पर बताया गया है।
इसका सामान्य अर्थ यह समझा जाता है कि जिस पेन से किसी व्यक्ति की जिंदगी से जुड़ा इतना बड़ा फैसला लिखा गया, उसका दोबारा इस्तेमाल न किया जाए। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पेन फेंकना भारतीय कानून में मौत की सजा सुनाने की अनिवार्य प्रक्रिया नहीं है। यह अपने आप में फैसले की कानूनी वैधता को प्रभावित नहीं करता।
इसलिए पेन फेंकने की घटना को प्रतीकात्मक कदम के रूप में देखना चाहिए, न कि ऐसा कानूनी नियम जिसके पालन के बिना मृत्युदंड का फैसला अधूरा रह जाता है।
जज ने महाभारत का जिक्र क्यों किया?
मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि फैसला सुनाने से पहले जज अरविंद कुमार मिश्रा ने महाभारत का संदर्भ दिया। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने दंड को धर्म से जोड़ते हुए अपराध के लिए सजा देने की बात कही।
इस संदर्भ का आशय यह था कि न्याय व्यवस्था में अपराध साबित होने पर कानून के अनुसार दंड दिया जाना भी न्याय का हिस्सा है। हालांकि, किसी भी आपराधिक मामले में सजा का आधार धार्मिक या व्यक्तिगत मान्यता नहीं, बल्कि लागू कानून, न्यायिक सिद्धांत और अदालत के सामने प्रस्तुत साक्ष्य होते हैं।
इस मामले में मौत की सजा का कानूनी आधार अदालत का फैसला है। महाभारत का उल्लेख फैसले के दौरान कही गई बात के रूप में सामने आया, जबकि सजा की वैधता का परीक्षण आगे उच्च अदालतों में भी हो सकता है।
‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ का क्या मतलब है?
भारत में मौत की सजा हर हत्या के मामले में नहीं दी जाती। सुप्रीम कोर्ट ने Bachan Singh बनाम State of Punjab मामले में यह सिद्धांत स्थापित किया था कि मृत्युदंड केवल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी दुर्लभतम से दुर्लभ मामलों में दिया जाना चाहिए।
इसका अर्थ यह है कि अदालत को यह देखना होता है कि अपराध की परिस्थितियां कितनी गंभीर हैं, अपराध किस तरह किया गया, अभियुक्त की भूमिका क्या थी और क्या आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त होगी। अदालत को अपराध से जुड़ी परिस्थितियों के साथ दोषी के व्यक्तिगत और सुधार की संभावनाओं से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होता है।
इस मामले में रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने हत्या की गंभीरता, अपराध की परिस्थितियों और उसे छिपाने के लिए किए गए प्रयासों को अपने फैसले में महत्व दिया। अदालत ने मामले को दुर्लभतम श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड दिया।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी अपराध की मीडिया में अधिक चर्चा होने से वह अपने आप ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ बन जाता है। इस श्रेणी का निर्धारण अदालत को कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर करना होता है।
मौत की सजा पर देश में क्या बहस चलती है?
मृत्युदंड को लेकर भारत और दुनिया के कई देशों में लंबे समय से बहस होती रही है। इस बहस के दो प्रमुख पक्ष हैं।
मृत्युदंड के समर्थन में तर्क: समर्थकों का मानना है कि अत्यंत गंभीर अपराधों में कठोरतम सजा न्याय और जवाबदेही का संदेश देती है। उनका तर्क है कि कुछ मामलों में अपराध की गंभीरता ऐसी होती है कि दोषी को मृत्युदंड देना उचित हो सकता है।
मृत्युदंड पर सवाल उठाने वाले तर्क: इसके आलोचक कहते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया में गलती की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती। यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से मौत की सजा मिल जाए और बाद में गलती सामने आए, तो उस नुकसान को ठीक करना संभव नहीं होगा। कुछ आलोचक यह सवाल भी उठाते हैं कि क्या मृत्युदंड अपराध रोकने में आजीवन कारावास से अधिक प्रभावी है।
भारत में मृत्युदंड कानून के तहत मौजूद है, लेकिन इसे असाधारण सजा माना जाता है। अदालतों को इस सजा पर पहुंचने से पहले मामले की परिस्थितियों और वैकल्पिक सजा की पर्याप्तता पर गंभीरता से विचार करना होता है।
क्या मुस्कान और साहिल को अब फांसी हो जाएगी?
नहीं, निचली अदालत से मौत की सजा मिलने का अर्थ यह नहीं है कि दोषियों को तुरंत फांसी दे दी जाएगी। भारतीय कानून में मृत्युदंड के मामलों के लिए कई अनिवार्य चरण हैं।
पहला चरण: हाईकोर्ट से पुष्टि। सत्र अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा को संबंधित हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना लागू नहीं किया जा सकता। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट को सजा और उससे जुड़े रिकॉर्ड की समीक्षा करनी होगी।
दूसरा चरण: ऊपरी अदालत में अपील। दोषियों को कानून के अनुसार हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अवसर मिल सकता है। इन अदालतों में सजा, साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया की समीक्षा हो सकती है।
तीसरा चरण: पुनर्विचार और क्यूरेटिव याचिका। लागू नियमों और परिस्थितियों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पुनर्विचार याचिका और कुछ मामलों में क्यूरेटिव याचिका का विकल्प भी उपलब्ध हो सकता है।
चौथा चरण: दया याचिका। कानूनी प्रक्रिया के उपयुक्त चरण पर दोषी राज्यपाल या राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका का विकल्प इस्तेमाल कर सकते हैं। इन प्रक्रियाओं का परिणाम आने तक मृत्युदंड पर अमल नहीं किया जा सकता।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि मुस्कान और साहिल को निश्चित रूप से कब फांसी दी जाएगी। आगे की कानूनी कार्यवाही और अदालतों के आदेश इस मामले की दिशा तय करेंगे।
फैसला महत्वपूर्ण, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अभी बाकी
मुस्कान-साहिल मामले में मृत्युदंड के फैसले ने एक बार फिर भारत में फांसी की सजा, न्यायिक विवेक और ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत पर चर्चा तेज कर दी है। पेन फेंकने की घटना प्रतीकात्मक रूप से चर्चा में जरूर है, लेकिन मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अदालत का फैसला और उसके बाद होने वाली कानूनी समीक्षा है।
मृत्युदंड जैसे अंतिम दंड में न्यायिक प्रक्रिया का प्रत्येक चरण महत्वपूर्ण होता है। इसी वजह से निचली अदालत के फैसले और सजा के वास्तविक अमल के बीच अंतर होता है। इस मामले में आगे की स्थिति हाईकोर्ट और अन्य सक्षम संवैधानिक व न्यायिक संस्थाओं की कार्यवाही के बाद ही स्पष्ट होगी।
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