
नाना पाटेकर ने कारगिल युद्ध में 60 दिन सेना के साथ बिताए थे: फिल्म छोड़कर पहुंचे थे मोर्चे पर, 20 किलो वजन घट गया था
मुंबई। अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका करीब पांच दशक लंबा फिल्मी सफर और जिंदगी से जुड़े कई अनसुने किस्से हमेशा याद किए जाएंगे। अभिनय के अलावा उनकी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय भी रहा, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर करीब 60 दिनों तक भारतीय सेना के जवानों के साथ रहे थे।
उस समय नाना पाटेकर अपने फिल्मी करियर के बेहद अहम दौर में थे। इसके बावजूद उन्होंने फिल्मों से दूरी बनाकर सेना के साथ रहने की इच्छा जताई। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस से अनुमति मांगी थी। बाद में वह सेना के साथ कारगिल क्षेत्र में गए और एक Quick Reaction Team (QRT) का हिस्सा भी रहे।
‘प्रहार’ के लिए शुरू हुआ था सेना से रिश्ता
नाना पाटेकर का सेना से जुड़ाव कारगिल युद्ध से काफी पहले शुरू हो गया था। साल 1991 में रिलीज हुई फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में उन्होंने सेना के अधिकारी का किरदार निभाया था।
इस भूमिका को वास्तविक बनाने के लिए नाना पाटेकर ने सेना के साथ कड़ी ट्रेनिंग ली थी। उन्होंने Maratha Light Infantry के साथ सैन्य प्रशिक्षण लिया। रिपोर्टों के मुताबिक यह ट्रेनिंग करीब तीन साल तक चली थी।
नाना पाटेकर खुद चाहते थे कि फिल्म में सैनिक का किरदार निभाने के लिए सिर्फ कैमरे के सामने की तैयारी न हो, बल्कि वह सैन्य अनुशासन और ट्रेनिंग को वास्तविक रूप से समझें।
यही अनुभव आगे चलकर उनके सेना से वास्तविक जुड़ाव की वजहों में से एक बना।
कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो सेना के साथ जाने की इच्छा जताई
1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध शुरू हुआ, उस समय नाना पाटेकर ने सैनिकों के साथ रहने की इच्छा जताई।
उन्होंने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया। उन्हें बताया गया कि किसी नागरिक को सीधे युद्ध क्षेत्र में भेजने का फैसला रक्षा मंत्रालय के स्तर पर ही किया जा सकता है।
इसके बाद नाना पाटेकर ने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस से संपर्क किया।
नाना ने बाद में एक इंटरव्यू में इस पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया था। उन्होंने रक्षा मंत्री को अपने सैन्य प्रशिक्षण और शूटिंग अनुभव के बारे में भी जानकारी दी थी। वह राष्ट्रीय स्तर पर राइफल शूटिंग में हिस्सा ले चुके थे और इस क्षेत्र में पदक भी जीत चुके थे।
जॉर्ज फर्नांडीस से मिली अनुमति
नाना पाटेकर के मुताबिक शुरुआत में उन्हें बताया गया कि वह एक नागरिक हैं और इस तरह सीधे सेना में शामिल नहीं हो सकते। इसके बाद उन्होंने अपने सैन्य प्रशिक्षण और हथियार चलाने के अनुभव के बारे में बताया।
आखिरकार उन्हें कारगिल क्षेत्र में सेना के साथ रहने की अनुमति मिल गई।
इसके बाद उन्होंने अपना फिल्मी काम कुछ समय के लिए रोक दिया और सैनिकों के बीच पहुंच गए। रिपोर्टों के अनुसार वह सेना की Quick Reaction Team के साथ भी रहे।
करीब 60 दिन सैनिकों के साथ रहे
नाना पाटेकर ने बताया था कि उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान करीब 60 दिन सेना के साथ बिताए।
इस दौरान उन्होंने अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों की यात्रा की। इनमें द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामुला और सोपोर जैसे इलाके शामिल बताए जाते हैं।
उनका अनुभव केवल किसी औपचारिक दौरे तक सीमित नहीं था। उन्होंने सैनिकों के साथ समय बिताया और उनके जीवन की कठिन परिस्थितियों को करीब से देखा।
हालांकि जब उनसे पूछा गया कि सेना के साथ रहते हुए उन्होंने वास्तव में क्या-क्या किया, तो नाना पाटेकर ने ऑपरेशनल जानकारी बताने से इनकार किया था। उन्होंने कहा था कि ऐसी चीजों के बारे में बात नहीं करनी चाहिए।
कारगिल में 20 किलो तक वजन कम होने की बात कही
कारगिल में रहने के दौरान नाना पाटेकर ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने बाद में बताया था कि जब वह श्रीनगर पहुंचे थे तो उनका वजन करीब 76 किलो था।
वापसी के समय उनका वजन लगभग 56 किलो रह गया था। यानी उनके मुताबिक इस दौरान करीब 20 किलो वजन कम हुआ।
उन्होंने सैनिकों की कठिन परिस्थितियों को भी करीब से देखा। ऊंचाई वाले इलाकों में कम तापमान, कठिन रास्ते और सीमित सुविधाओं के बीच जवानों के रहने का अनुभव उनके लिए भी चुनौतीपूर्ण रहा।
सिर्फ फिल्मों में सैनिक नहीं बने, असल जिंदगी में भी जवानों के बीच रहे
नाना पाटेकर की फिल्मों में सेना और देशभक्ति से जुड़े कई किरदार नजर आए। लेकिन उनकी कारगिल कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने सिर्फ पर्दे पर सैनिक की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वास्तविक युद्ध के दौरान सेना के साथ समय बिताया।
‘प्रहार’ के दौरान मिली सैन्य ट्रेनिंग ने उन्हें सेना के अनुशासन को समझने का मौका दिया था। बाद में कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने उसी जुड़ाव को वास्तविक जिंदगी में आगे बढ़ाया।
यही वजह है कि उनके निधन के बाद उनकी यह कहानी एक बार फिर सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्टों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
सेना से जुड़ा रिश्ता यहीं खत्म नहीं हुआ
नाना पाटेकर का सेना के साथ जुड़ाव सिर्फ कारगिल तक सीमित नहीं था। वह Territorial Army से भी जुड़े रहे थे और बाद में उन्हें मानद सैन्य पद से सम्मानित किए जाने की जानकारी सामने आई।
उनका सैन्य जीवन से जुड़ाव उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व का एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
फिल्मों में वह अक्सर सख्त और प्रभावशाली किरदार निभाते थे। वास्तविक जीवन में भी सेना के प्रति उनका सम्मान और जुड़ाव कई मौकों पर सामने आया।
नाना पाटेकर की जिंदगी का दूसरा चेहरा
नाना पाटेकर को आमतौर पर लोग उनकी फिल्मों और दमदार डायलॉग के लिए जानते हैं। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दी।
लेकिन उनकी जिंदगी में अभिनय के अलावा सेना और समाजसेवा भी महत्वपूर्ण रहे।
उनके निधन के बाद उनकी फिल्मों के साथ-साथ उनके सामाजिक कार्य और सेना से जुड़े अनुभव भी चर्चा में हैं। इससे जुड़ी अन्य खबरों के लिए पाठक Bulletino के मनोरंजन सेक्शन पर भी जा सकते हैं।
कारगिल का अनुभव हमेशा याद रहा
नाना पाटेकर ने बाद के वर्षों में भी कारगिल के अपने अनुभवों के बारे में बात की। उन्होंने बताया था कि सेना के साथ बिताया गया समय उनके जीवन के महत्वपूर्ण अनुभवों में से एक था।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह सेना के साथ अपने समय की संवेदनशील और ऑपरेशनल जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे।
कारगिल के दौरान उनका सैनिकों के साथ करीब दो महीने रहना उनकी जिंदगी की उन घटनाओं में शामिल है, जिसने उनकी सार्वजनिक छवि को फिल्मों से आगे बढ़ाया।
निधन के बाद फिर चर्चा में आई कारगिल की कहानी
8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर के निधन की खबर सामने आने के बाद उनके जीवन के अलग-अलग पहलू फिर से चर्चा में हैं। कार्डियक अरेस्ट के बाद गोवा में उनका निधन हुआ।
उनके निधन के बाद फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ उनके प्रशंसक उनके अभिनय, संवाद शैली और सामाजिक कामों को याद कर रहे हैं।
इसी बीच उनकी कारगिल की कहानी भी सामने आ रही है—एक ऐसा समय जब वह फिल्मी दुनिया की व्यस्तता से दूर होकर सैनिकों के बीच पहुंचे थे।
नाना पाटेकर और कारगिल: एक नजर में
- कारगिल युद्ध: 1999
- सेना के साथ समय: करीब 60 दिन
- भूमिका: Quick Reaction Team से जुड़ने की जानकारी
- तत्कालीन रक्षा मंत्री: जॉर्ज फर्नांडीस
- सेना प्रशिक्षण: ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ के लिए Maratha Light Infantry के साथ ट्रेनिंग
- बताया गया वजन: लगभग 76 किलो से 56 किलो
- जिन क्षेत्रों का उल्लेख किया: द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामुला और सोपोर
