नाना पाटेकर की 7 सबसे यादगार फिल्में: परिंदा के अन्ना से वेलकम के उदय शेट्टी तक, हर किरदार था अलग
मुंबई। नाना पाटेकर के निधन के बाद उनके करीब पांच दशक लंबे फिल्मी सफर को एक बार फिर याद किया जा रहा है। 75 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले नाना पाटेकर उन कलाकारों में शामिल रहे, जिन्होंने सिर्फ हीरो बनकर नहीं, बल्कि अलग-अलग तरह के किरदारों में अपनी पहचान बनाई।
कभी वह पर्दे पर खतरनाक विलेन बने, कभी सिस्टम से लड़ने वाला आम आदमी, कभी पुलिस अधिकारी और कभी ऐसा कॉमेडी किरदार जिसे देखकर दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की अलग-अलग तस्वीर पेश की।
नाना पाटेकर की खासियत यह थी कि वह जिस किरदार को निभाते थे, उसमें अपनी आवाज, चेहरे के हावभाव और संवाद बोलने के अंदाज से जान डाल देते थे।
1. परिंदा – अन्ना के किरदार ने बना दिया खतरनाक विलेन
साल 1989 में रिलीज हुई ‘परिंदा’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में उन्होंने अन्ना नाम के खूंखार गैंगस्टर का किरदार निभाया था।
अन्ना के किरदार में नाना ने गुस्से, डर और हिंसक व्यक्तित्व को जिस तरह पर्दे पर उतारा, उसने दर्शकों को प्रभावित किया। यह किरदार उनकी अभिनय क्षमता की बड़ी पहचान बन गया।
फिल्म में जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर जैसे कलाकार भी थे, लेकिन नाना पाटेकर का अन्ना वाला किरदार अलग से चर्चा में रहा।
‘परिंदा’ के लिए नाना पाटेकर को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला था। यह उनके करियर के शुरुआती बड़े सम्मान में से एक था।
यही वह फिल्म थी जिसने नाना पाटेकर को हिंदी सिनेमा में एक बेहद गंभीर और प्रभावशाली अभिनेता के रूप में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
2. क्रांतिवीर – गुस्से और विद्रोह की आवाज बने नाना
1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक रही। इसमें उन्होंने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया था।
फिल्म का किरदार व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है। नाना ने इस भूमिका में गुस्सा, दर्द और विद्रोह तीनों को बेहद प्रभावशाली तरीके से पेश किया।
इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला। साथ ही फिल्मफेयर में भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला।
‘क्रांतिवीर’ के कई संवाद और नाना का बोलने का अंदाज आज भी उनके सबसे यादगार फिल्मी पलों में गिना जाता है।
3. अग्निसाक्षी – गंभीर भूमिका में फिर जीता दिल
साल 1996 में आई ‘अग्निसाक्षी’ में नाना पाटेकर ने एक अलग तरह का किरदार निभाया।
फिल्म में उनके सामने मनीषा कोइराला और जैकी श्रॉफ जैसे कलाकार थे। नाना का किरदार कहानी में तनाव और गंभीरता को बढ़ाता है।
इस फिल्म में उनके अभिनय को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला।
यह नाना पाटेकर के करियर की खास बात थी कि वह लगातार अलग-अलग तरह की भूमिकाओं में दिखाई देते रहे और हर बार दर्शकों को नया रूप देखने को मिला।
4. अब तक छप्पन – पुलिस अधिकारी के रूप में अलग अंदाज
साल 2004 की फिल्म ‘अब तक छप्पन’ में नाना पाटेकर ने पुलिस अधिकारी साधु आगाशे का किरदार निभाया था।
यह फिल्म मुंबई पुलिस के एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की कहानी के इर्द-गिर्द घूमती है। नाना ने इस किरदार में ज्यादा शोर-शराबे के बजाय शांत और सख्त अंदाज अपनाया।
उनकी आंखों के हावभाव, संवाद बोलने का तरीका और किरदार की गंभीरता ने फिल्म को अलग पहचान दी।
नाना के करियर में यह वह दौर था जब वह एक तरफ गंभीर फिल्मों में अपनी पकड़ बनाए हुए थे और दूसरी तरफ मुख्यधारा के दर्शकों के बीच भी उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी।
5. वेलकम – उदय शेट्टी बनकर कॉमेडी का अंदाज बदल दिया
अगर किसी ने नाना पाटेकर को सिर्फ गंभीर अभिनेता समझा था, तो ‘वेलकम’ ने उनकी यह छवि पूरी तरह बदल दी।
2007 में रिलीज हुई इस फिल्म में नाना ने उदय शेट्टी का किरदार निभाया। फिल्म में अक्षय कुमार, अनिल कपूर, परेश रावल और कैटरीना कैफ जैसे कलाकार थे।
उदय शेट्टी एक गैंगस्टर है, लेकिन फिल्म में उसके किरदार को कॉमेडी के साथ पेश किया गया। नाना ने अपनी गंभीर आवाज और गुस्से वाले अंदाज को ही कॉमेडी का हिस्सा बना दिया।
उनका अनिल कपूर के साथ कॉमिक तालमेल फिल्म की सबसे बड़ी खासियतों में से एक बन गया।
“कंट्रोल उदय” जैसे डायलॉग और उदय शेट्टी का किरदार बाद में इंटरनेट मीम्स और सोशल मीडिया पर भी खूब लोकप्रिय हुआ।
नाना की यही versatility थी जिसने उन्हें सिर्फ गंभीर भूमिकाओं तक सीमित नहीं रहने दिया।
6. राजनीति – दमदार कलाकारों के बीच भी अलग पहचान
2010 में आई ‘राजनीति’ में नाना पाटेकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकाश झा की इस राजनीतिक ड्रामा फिल्म में अजय देवगन, रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और मनोज बाजपेयी जैसे कलाकार भी थे।
नाना ने फिल्म में ब्रिज गोपाल नाम का किरदार निभाया। यह भूमिका सीधे तौर पर राजनीतिक सत्ता, परिवार और रणनीति की कहानी से जुड़ी थी।
इतने बड़े कलाकारों वाली फिल्म में भी नाना की मौजूदगी अलग महसूस होती थी। उनकी संवाद अदायगी और गंभीर स्क्रीन प्रेजेंस ने किरदार को मजबूत बनाया।
यह फिल्म उनके करियर में उस दौर का हिस्सा थी जब वह लगातार अलग-अलग जॉनर की फिल्मों में काम कर रहे थे।
7. नटसम्राट – थिएटर के कलाकार की जिंदगी पर्दे पर उतारी
2016 में आई मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे भावनात्मक फिल्मों में से एक रही।
इस फिल्म में उन्होंने गणपतराव बेलवलकर का किरदार निभाया। वह एक बुजुर्ग रंगमंच कलाकार हैं, जो अपने जीवन के अंतिम दौर में परिवार, अकेलेपन और अपनी पहचान से जूझते हैं।
नाना खुद लंबे समय तक थिएटर से जुड़े रहे थे। इसलिए इस किरदार में उनकी निजी थिएटर समझ भी दिखाई दी।
‘नटसम्राट’ में उन्होंने उम्रदराज कलाकार की खुशी, अहंकार, दर्द, अकेलापन और टूटन को बेहद प्रभावी तरीके से पेश किया। इस भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्टर – मराठी भी मिला।
कई लोगों के लिए यह उनके करियर की सबसे बेहतरीन भूमिकाओं में से एक रही।
नाना पाटेकर की खासियत सिर्फ गंभीर अभिनय नहीं था
नाना पाटेकर के फिल्मी सफर को सिर्फ गंभीर किरदारों से समझना अधूरा होगा।
उन्होंने एक ही करियर में गैंगस्टर, पुलिस अधिकारी, सामाजिक विद्रोही, विलेन, कॉमेडी किरदार और थिएटर कलाकार जैसे बिल्कुल अलग-अलग चरित्र निभाए।
यही वजह है कि ‘परिंदा’ का अन्ना और ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी एक ही अभिनेता के किरदार होने के बावजूद बिल्कुल अलग महसूस होते हैं।
उनकी आवाज और संवाद बोलने का तरीका दोनों किरदारों में मौजूद था, लेकिन अभिनय की शैली पूरी तरह बदल गई थी।
तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड ने बनाई अलग पहचान
नाना पाटेकर उन चुनिंदा अभिनेताओं में रहे जिन्हें तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिले।
उनकी प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता भूमिकाओं में:
- परिंदा – बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर
- क्रांतिवीर – बेस्ट एक्टर
- अग्निसाक्षी – बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर
इन पुरस्कारों से यह भी पता चलता है कि उनका अभिनय सिर्फ दर्शकों के बीच लोकप्रिय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार सम्मानित हुआ।
बॉलीवुड से मराठी सिनेमा तक रहा प्रभाव
नाना पाटेकर ने हिंदी फिल्मों के साथ मराठी सिनेमा में भी महत्वपूर्ण काम किया।
उनकी थिएटर पृष्ठभूमि ने उन्हें दूसरे फिल्म कलाकारों से अलग बनाया। वह अभिनय को सिर्फ संवाद बोलने तक सीमित नहीं रखते थे। चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव और शरीर की भाषा उनके किरदार का हिस्सा बन जाते थे।
उनके निधन के बाद भारतीय सिनेमा में उनकी इसी अलग शैली को याद किया जा रहा है।
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नाना पाटेकर के ये किरदार क्यों याद रहेंगे?
नाना पाटेकर के किरदारों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं लगते थे। कई बार ऐसा महसूस होता था कि पूरा सीन उनके आने के बाद बदल गया।
उनकी आवाज, ठहराव और संवाद बोलने का तरीका इतना अलग था कि छोटी लाइन भी याद रह जाती थी।
यही वजह है कि उनके निधन के बाद दर्शक सिर्फ उनकी फिल्मों को नहीं, बल्कि उनके द्वारा निभाए गए किरदारों को भी याद कर रहे हैं।
नाना पाटेकर की 7 यादगार फिल्में एक नजर में
| फिल्म | साल | यादगार किरदार/पहचान |
|---|---|---|
| परिंदा | 1989 | अन्ना |
| क्रांतिवीर | 1994 | प्रताप नारायण तिलक |
| अग्निसाक्षी | 1996 | गंभीर सपोर्टिंग भूमिका |
| अब तक छप्पन | 2004 | साधु आगाशे |
| वेलकम | 2007 | उदय शेट्टी |
| राजनीति | 2010 | ब्रिज गोपाल |
| नटसम्राट | 2016 | गणपतराव बेलवलकर |
नाना पाटेकर की विरासत फिल्मों से कहीं बड़ी है
नाना पाटेकर ने करीब पांच दशक तक सिनेमा में काम किया। उन्होंने अपनी पहचान बनाने के लिए पारंपरिक हीरो की छवि पर निर्भर रहने के बजाय अभिनय को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
उनका सफर थिएटर से शुरू होकर हिंदी और मराठी सिनेमा तक पहुंचा। उन्होंने गंभीर फिल्मों में राष्ट्रीय पुरस्कार जीते और फिर ‘वेलकम’ जैसी कॉमेडी में नई पीढ़ी को भी अपना प्रशंसक बनाया।
8 अक्टूबर 2026 को उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया जिसकी आवाज और अभिनय शैली की नकल करना आसान नहीं था।
नाना पाटेकर के किरदार आने वाले वर्षों में भी फिल्मों के जरिए दर्शकों के बीच जिंदा रहेंगे।
