जयपुर: राजस्थान में कम बारिश और कई इलाकों में पानी की समस्या के बीच जयपुर से सरकारी पानी की सप्लाई को लेकर चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक मीडिया इन्वेस्टिगेशन के मुताबिक जयपुर में सरकारी हाइड्रेंट पॉइंट से मिलने वाले बीसलपुर के पानी को टैंकरों के जरिए निजी तौर पर बेचने के आरोप सामने आए हैं।
रिपोर्ट में पानी के टैंकर की आवाजाही पर नजर रखने के लिए GPS लगाया गया और अलग-अलग जगहों पर घंटों तक सरकारी टैंकरों की गिनती की गई। इन्वेस्टिगेशन में विभागीय रिकॉर्ड और मौके पर दिखाई देने वाली संख्या के बीच अंतर सामने आने का दावा किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक मालवीय नगर में एक टैंकर को GPS से ट्रैक करने पर उसकी एक दिन की आवाजाही करीब 17 किलोमीटर मिली। वहीं ट्रांसपोर्ट नगर में कई घंटे तक टैंकरों की गिनती की गई तो रिकॉर्ड में दर्ज संख्या से ज्यादा टैंकर पानी भरते हुए दिखाई दिए।
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GPS लगाकर टैंकर का पीछा किया
इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक जयपुर के मालवीय नगर क्षेत्र में एक पानी के टैंकर पर GPS लगाया गया। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि सरकारी पानी भरने के बाद टैंकर कहां-कहां जाता है और एक दिन में कितनी दूरी तय करता है।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि टैंकर ने एक दिन में करीब 17 किलोमीटर की दूरी तय की। इन्वेस्टिगेशन के अनुसार, इस दूरी और टैंकर की गतिविधियों से यह सवाल उठा कि सरकारी रिकॉर्ड में निर्धारित सप्लाई के अलावा क्या अतिरिक्त चक्कर लगाए जा रहे थे।
रिपोर्ट के मुताबिक GPS लगाए जाने की जानकारी सामने आने के बाद अगले दिन टैंकर बदल दिया गया और पहले इस्तेमाल किए जा रहे टैंकर की जगह दूसरा टैंकर दिखाई दिया।
300 से 400 रुपए में पानी बेचने का आरोप
इन्वेस्टिगेशन में रिपोर्टर ने ग्राहक बनकर टैंकर के लिए संपर्क किया। रिपोर्ट के अनुसार बीसलपुर के पानी की मांग करने पर पहले 400 रुपए तक की कीमत बताई गई और बातचीत के बाद करीब 350 रुपए में टैंकर देने की बात कही गई।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि बिल्डिंग और निर्माण कार्यों के लिए बीसलपुर का पानी लेने की मांग की गई थी। कथित तौर पर टैंकर उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति ने पानी की सप्लाई को लेकर हामी भरी।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये दावे मीडिया इन्वेस्टिगेशन में सामने आए आरोपों पर आधारित हैं। संबंधित व्यक्तियों या सभी टैंकर संचालकों के खिलाफ पानी बेचने का आरोप साबित होना अलग-अलग जांच और कार्रवाई का विषय है।
ट्रांसपोर्ट नगर में रिकॉर्ड से ज्यादा टैंकर?
इन्वेस्टिगेशन के दूसरे हिस्से में ट्रांसपोर्ट नगर के वाटर पॉइंट पर कई घंटों तक टैंकरों की गिनती की गई।
रिपोर्ट के अनुसार विभागीय रिकॉर्ड में 20 से 26 सितंबर के बीच इस क्षेत्र के तीन पॉइंट से करीब 796 टैंकर भेजे गए थे। यानी रोजाना औसतन करीब 100 से 113 टैंकर की सप्लाई का रिकॉर्ड था।
वहीं रिपोर्टर ने एक दिन सुबह से शाम तक मौके पर टैंकरों की गिनती की। रिपोर्ट में दावा किया गया कि तीन पॉइंट पर करीब छह घंटे के दौरान 180 तक टैंकर पानी भरते हुए दिखाई दिए।
अगर रिकॉर्ड और मौके पर दिखाई देने वाली संख्या में अंतर है, तो यह विभागीय निगरानी और रिकॉर्ड सिस्टम की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है। हालांकि वास्तविक अनियमितता की पुष्टि संबंधित विभाग की आधिकारिक जांच के बाद ही मानी जाएगी।
खो-नागोरियान में फ्लो मीटर ने भी दिखाया अंतर
इन्वेस्टिगेशन में जयपुर के खो-नागोरियान क्षेत्र का भी जिक्र किया गया है। यहां सरकारी रिकॉर्ड और फ्लो मीटर के आंकड़ों की तुलना की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक 20 से 26 सितंबर के सात दिनों में सरकारी रिकॉर्ड में 439 टैंकर सप्लाई दिखाए गए थे। इसका औसत करीब 60 टैंकर प्रतिदिन बैठता है।
लेकिन फ्लो मीटर के डेटा की जांच में सात दिनों में करीब 623 टैंकर के बराबर पानी निकलने का दावा किया गया। यानी औसतन करीब 90 टैंकर प्रतिदिन।
रिपोर्ट में बताया गया कि एक बार वॉल्व खोलने पर करीब 4,000 लीटर पानी आता है, जिसे एक टैंकर की क्षमता के बराबर माना गया।
सरकारी पानी की सप्लाई कैसे होती है?
जयपुर में जिन इलाकों में पेयजल की समस्या होती है, वहां जरूरत के अनुसार टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाया जाता है। इन टैंकरों के लिए अलग-अलग हाइड्रेंट पॉइंट बनाए गए हैं।
इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक इन पॉइंट से मिलने वाला पानी जनता के लिए सरकारी सप्लाई व्यवस्था का हिस्सा है और इसके लिए आम लोगों से सीधे पानी की कीमत नहीं ली जाती। टैंकर संचालन के लिए सरकार की ओर से तय दर और दूरी के हिसाब से भुगतान किया जाता है।
यही वजह है कि अगर सरकारी व्यवस्था से मिलने वाले पानी को किसी निजी व्यक्ति या निर्माण कार्य के लिए पैसे लेकर बेचने की पुष्टि होती है तो यह गंभीर अनियमितता का मामला बन सकता है।
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ठेकेदार बदलते हैं, ड्राइवर लंबे समय से वही रहने का दावा
इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में जलदाय विभाग की टैंकर व्यवस्था से जुड़ी एक और समस्या का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक टेंडर के जरिए ठेकेदार बदलते रहते हैं, लेकिन कई टैंकर ड्राइवर लंबे समय से उसी व्यवस्था में काम करते हैं।
रिपोर्ट में कुछ ड्राइवरों के 12 से 15 साल तक काम करने का दावा किया गया है। इससे यह सवाल उठता है कि ठेकेदार बदलने के बावजूद पुराने ऑपरेशनल सिस्टम की निगरानी किस तरह की जाती है।
हालांकि इस संबंध में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने के लिए विभागीय जांच जरूरी होगी।
पानी बेचने की शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है?
जलदाय विभाग के एडीशनल चीफ इंजीनियर अजय सिंह राठौड़ के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर पानी बेचने की शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित ड्राइवर पर पेनल्टी लगाई जा सकती है और उसे ब्लैकलिस्ट कर हटाया जा सकता है। लगातार शिकायतें मिलने पर संबंधित ठेकेदार का टेंडर भी रद्द किया जा सकता है।
इसका मतलब यह है कि विभाग के पास कार्रवाई के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इन्वेस्टिगेशन में सामने आए अंतर के बाद निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
पानी चोरी पर कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान
राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की नागरिक चार्टर जानकारी के अनुसार अवैध पानी कनेक्शन मिलने पर चोरी की FIR दर्ज कराई जा सकती है। विभाग अनधिकृत जल संबंधों और अवैध कनेक्शन की शिकायतों पर कार्रवाई की बात भी करता है।
इसलिए सरकारी पानी की चोरी या अवैध तरीके से इस्तेमाल की शिकायत मिलने पर मामला सिर्फ विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता। परिस्थितियों के अनुसार पुलिस और अन्य संबंधित कानूनों के तहत भी कार्रवाई हो सकती है।
GPS और फ्लो मीटर से बढ़ सकती है निगरानी
इस पूरे मामले में GPS और फ्लो मीटर दो महत्वपूर्ण तकनीकी माध्यम के रूप में सामने आते हैं। GPS से यह पता लगाया जा सकता है कि टैंकर कहां-कहां गया और कितनी दूरी तय की।
वहीं फ्लो मीटर से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी पॉइंट से वास्तव में कितना पानी निकला। अगर इन दोनों तकनीकी आंकड़ों को सरकारी रिकॉर्ड से जोड़ दिया जाए तो टैंकर संचालन में किसी संभावित गड़बड़ी की पहचान करना आसान हो सकता है।
राजस्थान में भूजल और टैंकरों की निगरानी को लेकर भी नियम मौजूद हैं। सितंबर 2026 के एक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल आदेश में राजस्थान में भूजल निकालने वाले बल्क वाटर सप्लायर टैंकरों के लिए GPS आधारित निगरानी व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
असली सवाल—सरकारी रिकॉर्ड और मौके के आंकड़ों में अंतर क्यों?
इस इन्वेस्टिगेशन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सरकारी रिकॉर्ड में कम टैंकर दिख रहे हैं और फ्लो मीटर या मौके की गिनती में ज्यादा टैंकर सामने आते हैं, तो दोनों आंकड़ों में अंतर क्यों है।
क्या रिकॉर्ड अपडेट करने में देरी है? क्या किसी तकनीकी कारण से डेटा में अंतर आया? या वास्तव में कुछ टैंकर अतिरिक्त पानी लेकर जा रहे हैं? इन सवालों का जवाब विभागीय जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड की विस्तृत जांच के बाद ही मिल सकेगा।
फिलहाल इन्वेस्टिगेशन ने जयपुर की टैंकर आधारित पेयजल व्यवस्था की निगरानी को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
जयपुर में पानी की व्यवस्था पर निगरानी जरूरी
जयपुर जैसे बड़े शहर में गर्मी और कम बारिश के दौरान टैंकरों के जरिए पेयजल पहुंचाना कई इलाकों के लिए जरूरी हो जाता है। ऐसे में सरकारी पानी की हर खेप का सही रिकॉर्ड और उसकी निगरानी महत्वपूर्ण है।
GPS ट्रैकिंग, फ्लो मीटर, डिजिटल रिकॉर्ड और टैंकरों की नियमित जांच जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो संभावित गड़बड़ियों पर नजर रखी जा सकती है।
फिलहाल सामने आई रिपोर्ट के आधार पर पानी बेचने और रिकॉर्ड में अंतर के आरोपों की स्वतंत्र विभागीय पुष्टि का इंतजार रहेगा।
नोट: इस खबर में बताए गए आंकड़े और आरोप प्रकाशित मीडिया इन्वेस्टिगेशन पर आधारित हैं। किसी व्यक्ति या टैंकर संचालक को दोषी ठहराने से पहले संबंधित विभाग की जांच और कानूनी प्रक्रिया का पूरा होना जरूरी है।

