एक समय ऐसा था जब चीन दुनिया की सबसे गरीब और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था। 1978 में चीन की प्रति व्यक्ति आय दुनिया के औसत का केवल करीब 5 प्रतिशत थी और उसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक बंद एवं सरकारी नियंत्रण वाली थी। लेकिन इसके बाद चीन ने जिस गति से अपनी अर्थव्यवस्था को बदला, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। विश्व बैंक के अनुसार 1978 के बाद चीन की GDP वृद्धि औसतन 9 प्रतिशत से अधिक रही और करीब 80 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकालने में मदद मिली।
यही वजह है कि आज चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और मैन्युफैक्चरिंग, एक्सपोर्ट, इंफ्रास्ट्रक्चर और कई आधुनिक तकनीकों में उसका प्रभाव बेहद बड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर चीन ने यह बदलाव किया कैसे?

1978 में शुरू हुआ चीन का सबसे बड़ा आर्थिक बदलाव
चीन की आर्थिक कहानी को समझने के लिए 1978 का साल सबसे महत्वपूर्ण है। उस समय देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में चीन ने “रिफॉर्म एंड ओपनिंग अप” यानी सुधार और आर्थिक खुलापन शुरू किया।
इससे पहले चीन की अर्थव्यवस्था में सरकार का नियंत्रण बहुत ज्यादा था। कृषि में सामूहिक व्यवस्था थी और बड़ी संख्या में सरकारी कंपनियां भारी उद्योगों पर केंद्रित थीं।
1978 के बाद चीन ने धीरे-धीरे बाजार आधारित व्यवस्था को जगह देना शुरू किया। कृषि क्षेत्र में किसानों को अपनी मेहनत का अतिरिक्त लाभ रखने की अधिक स्वतंत्रता मिली। इससे उत्पादन बढ़ा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव शुरू हुआ। IMF के अनुसार चीन के सुधारों की पहली बड़ी लहर ग्रामीण कृषि सुधारों से शुरू हुई थी।
चीन का पहला बड़ा फॉर्मूला था—छोटे प्रयोग, फिर बड़े बदलाव
चीन ने एक साथ पूरी अर्थव्यवस्था बदलने की बजाय कई नीतियों को पहले छोटे स्तर पर आजमाया।
अगर कोई प्रयोग सफल हुआ तो उसे दूसरे क्षेत्रों में लागू किया गया। यही तरीका चीन की आर्थिक नीति की खास पहचान बना।
इसके साथ ही चीन ने विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी Special Economic Zones बनाए। 1980 में चार प्रमुख विशेष आर्थिक क्षेत्रों की शुरुआत की गई, जिनका उद्देश्य विदेशी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग को आकर्षित करना था। इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत ज्यादा आर्थिक स्वतंत्रता और व्यापारिक सुविधाएं दी गईं।
विदेशी कंपनियों को चीन बुलाया गया
चीन ने यह समझ लिया कि केवल घरेलू पूंजी से तेज औद्योगिकीकरण करना मुश्किल होगा।
इसलिए उसने विदेशी कंपनियों को चीन में फैक्ट्रियां लगाने के लिए आकर्षित किया। कम लागत वाली बड़ी श्रम शक्ति, जमीन, बंदरगाह, इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्यात के अवसरों ने चीन को मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए आकर्षक बनाया।
धीरे-धीरे इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, खिलौने, मशीनरी और दूसरे उत्पादों का बड़े पैमाने पर उत्पादन चीन में होने लगा।
इस प्रक्रिया ने चीन को दुनिया की सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया।
चीन ने “दुनिया की फैक्ट्री” बनने पर जोर दिया
चीन की आर्थिक सफलता का एक बड़ा हिस्सा उसके मैन्युफैक्चरिंग मॉडल से जुड़ा है।
देश ने बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियां, औद्योगिक क्षेत्र, सड़कें, बंदरगाह, रेलवे और बिजली की क्षमता विकसित की।
इसका सीधा फायदा निर्यात को मिला। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक चीन का वैश्विक निर्यात में हिस्सा 1990 में 2 प्रतिशत से भी कम था, जो 2018 तक करीब 11 प्रतिशत पहुंच गया।
यानी चीन ने केवल घरेलू बाजार पर निर्भर रहने की बजाय पूरी दुनिया के लिए सामान बनाना शुरू किया।
1990 के दशक में आया दूसरा बड़ा बदलाव
1990 के दशक में चीन ने बाजार सुधारों को और आगे बढ़ाया। देंग शियाओपिंग की 1992 की Southern Tour के बाद आर्थिक सुधारों को नई गति मिली।
स्थानीय सरकारों को निवेश और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में ज्यादा भूमिका मिली। इसी दौर में सरकारी कंपनियों के पुनर्गठन और बाजार आधारित व्यवस्था को बढ़ाने की प्रक्रिया तेज हुई।
इसका परिणाम यह हुआ कि चीन में उद्योग, निवेश और निर्यात तेजी से बढ़ने लगे।
2001 में WTO की एंट्री ने बदल दिया खेल
चीन की आर्थिक यात्रा में 2001 एक और बड़ा मोड़ था।
चीन World Trade Organization यानी WTO में शामिल हुआ। इसके बाद चीन का वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से जुड़ाव और तेज हुआ।
विदेशी कंपनियों के लिए चीन में उत्पादन करना और वहां से दुनिया के अलग-अलग बाजारों में सामान भेजना और आसान हुआ।
IMF के अनुसार WTO में प्रवेश ने चीन की वैश्विक अर्थव्यवस्था में मौजूदगी को तेजी से बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सिर्फ सस्ता सामान नहीं, पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया
चीन की कहानी को केवल “सस्ता मजदूर” कहकर समझना अधूरा होगा।
देश ने बड़े पैमाने पर बंदरगाह, एक्सप्रेसवे, बिजली संयंत्र, औद्योगिक पार्क, रेलवे और शहरों का निर्माण किया।
इस इंफ्रास्ट्रक्चर ने कंपनियों को कम समय और कम लागत में उत्पादन तथा सामान की आवाजाही की सुविधा दी।
यानी चीन ने एक ऐसा पूरा औद्योगिक सिस्टम तैयार किया जिसमें फैक्ट्री से लेकर बंदरगाह और वहां से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पूरी सप्लाई चेन को मजबूत किया गया।
फिर चीन टेक्नोलॉजी की तरफ बढ़ा
शुरुआती दौर में चीन मुख्य रूप से कम लागत वाले उत्पादों का बड़ा निर्यातक बना।
लेकिन समय के साथ उसकी रणनीति बदली।
इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में चीन ने बड़े निवेश किए।
यानी मॉडल धीरे-धीरे “दूसरों के लिए सामान बनाने” से आगे बढ़कर “अपनी तकनीक और कंपनियां विकसित करने” की तरफ गया।
World Economic Forum के विश्लेषण के अनुसार चीन की आर्थिक परिवर्तन यात्रा में इंफ्रास्ट्रक्चर, विदेशी निवेश, डिजिटल इनोवेशन और रणनीतिक औद्योगिक नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
चीन की आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा परिणाम—गरीबी में भारी कमी
चीन की आर्थिक कहानी का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव गरीबी में कमी के रूप में देखा जाता है।
विश्व बैंक के अनुसार 1978 के बाद करीब 80 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकले। चीन एक निम्न-आय वाली अर्थव्यवस्था से ऊपरी-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था में बदल गया।
यह बदलाव केवल GDP बढ़ने तक सीमित नहीं रहा। लाखों लोगों के शहरों की तरफ जाने, औद्योगिक रोजगार बढ़ने और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से चीन के समाज में भी बड़ा परिवर्तन आया।
क्या अमेरिका वास्तव में चीन के सामने “झुक” रहा है?
यह दावा थोड़ा सावधानी से समझने की जरूरत है।
अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और वित्तीय शक्तियों में से एक है। डॉलर की वैश्विक भूमिका, अमेरिकी वित्तीय बाजार, तकनीकी कंपनियां और निवेश क्षमता अभी भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी तरफ चीन का आर्थिक और औद्योगिक वजन इतना बढ़ चुका है कि अमेरिका सहित बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को चीन के साथ व्यापार, सप्लाई चेन, तकनीक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के मुद्दों पर नीतियां बनानी पड़ती हैं।
कुछ विश्लेषणों में चीन को अमेरिका का सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बताया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका हर क्षेत्र में चीन से पीछे हो गया है। उदाहरण के लिए, Belfer Center के विश्लेषण में चीन की मैन्युफैक्चरिंग और व्यापारिक ताकत के साथ-साथ डॉलर, अमेरिकी इक्विटी बाजार और वेंचर कैपिटल में अमेरिका की बढ़त को भी रेखांकित किया गया है।
इसलिए “अमेरिका चीन के सामने झुक रहा है” की जगह यह कहना ज्यादा तथ्यात्मक है कि अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक एवं तकनीकी प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई है।
चीन के फॉर्मूले में सरकार और बाजार दोनों शामिल रहे
चीन की आर्थिक व्यवस्था को केवल पूंजीवाद या केवल सरकारी अर्थव्यवस्था के रूप में समझना आसान नहीं है।
उसका मॉडल बाजार शक्तियों, निजी कंपनियों, सरकारी कंपनियों, औद्योगिक नीति और सरकारी निवेश के मिश्रण पर आधारित रहा है।
IMF के अनुसार चीन के विकास में बाजार आधारित सुधारों और राज्य द्वारा संसाधनों को दिशा देने वाली नीतियों दोनों की भूमिका रही। 1999 से 2015 के बीच औद्योगिक राजस्व में राज्य-नियंत्रित कंपनियों की हिस्सेदारी भी काफी कम हुई, हालांकि हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने की गति कमजोर पड़ी है।
लेकिन चीन के सामने अब नई चुनौतियां भी हैं
चीन की आर्थिक कहानी पूरी तरह समस्याओं से मुक्त नहीं है।
तेज विकास के कई दशकों के बाद अब चीन को धीमी आर्थिक वृद्धि, रियल एस्टेट संकट, स्थानीय सरकारों और कंपनियों के कर्ज, कमजोर घरेलू मांग तथा जनसांख्यिकीय बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
IMF के अनुसार चीन को आगे आर्थिक विकास के लिए उपभोग, सेवाओं और उत्पादकता को ज्यादा महत्व देना होगा। साथ ही निजी क्षेत्र की गतिशीलता और नई तकनीकों में इनोवेशन को मजबूत करना भी जरूरी होगा।

चीन की पूरी कहानी का सार क्या है?
अगर चीन की आर्थिक यात्रा को कुछ प्रमुख बिंदुओं में समझें तो इसका मॉडल लगभग इस तरह दिखाई देता है—
1978 में आर्थिक सुधार → कृषि सुधार → विशेष आर्थिक क्षेत्र → विदेशी निवेश → मैन्युफैक्चरिंग → निर्यात → इंफ्रास्ट्रक्चर → WTO → तकनीकी निवेश → वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत स्थिति।
यही लंबी प्रक्रिया चीन को एक गरीब और अपेक्षाकृत बंद अर्थव्यवस्था से दुनिया की सबसे प्रभावशाली आर्थिक शक्तियों में से एक तक ले गई।
इसलिए चीन का “जादुई फॉर्मूला” किसी एक योजना या एक नेता का परिणाम नहीं था। यह कई दशकों तक चले आर्थिक प्रयोग, सुधार, औद्योगिकीकरण, वैश्विक व्यापार, भारी निवेश और तकनीकी बदलाव का संयुक्त परिणाम था।
आज चीन को लेकर अमेरिका और बाकी दुनिया की रणनीति भी इसी आर्थिक बदलाव को ध्यान में रखकर बन रही है। लेकिन चीन के सामने भी विकास की अगली मंजिल हासिल करने के लिए कई गंभीर आर्थिक चुनौतियां मौजूद हैं।