नई दिल्ली में गुरुवार को चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई। Cockroach Janta Party यानी CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए उन्हें 48 घंटे का समय देने की बात कही है। संगठन के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके और अन्य पदाधिकारियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यदि तय समय के भीतर इस्तीफा नहीं दिया गया तो देशभर में आंदोलन शुरू किया जाएगा। CJP ने दिल्ली में दोबारा बड़े धरने की चेतावनी भी दी है। संगठन ने अपने अभियान को “Election Commission Thik Karo” नाम दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर मतदाता सूची में नामों के शामिल होने और हटाए जाने पर चर्चा जारी है। CJP ने इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही की मांग उठाई है। हालांकि, संगठन की ओर से लगाए गए आरोपों और चुनाव आयोग के रुख को अलग-अलग समझना जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने निर्णय प्रक्रिया में मतभेद की अलग व्याख्या दी है और अपने फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।

CJP ने 48 घंटे में इस्तीफे की मांग क्यों की
इस पूरे विवाद का केंद्र SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर उठे सवाल हैं। CJP का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े स्तर पर हुए बदलावों को लेकर आयोग को जनता के सामने पर्याप्त जानकारी रखनी चाहिए। संगठन ने दावा किया कि SIR के दौरान कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में बड़ी संख्या में नाम शामिल नहीं रहे। CJP ने अलग-अलग राज्यों में हटाए गए या बाहर रह गए नामों के आंकड़ों का हवाला देते हुए इस प्रक्रिया की समीक्षा की मांग की है। दूसरी ओर, इन आंकड़ों और प्रक्रिया से जुड़े दावों को संदर्भ के साथ देखना जरूरी है, क्योंकि मतदाता सूची का संशोधन कई चरणों में होता है और नाम हटाने या जोड़ने के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं लागू रहती हैं। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, CJP ने चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज कथित आपत्तियों और केंद्रीयकृत चुनावी डेटा से जुड़े सवालों पर भी स्पष्टीकरण मांगा है। इसी पृष्ठभूमि में संगठन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और स्वतंत्र जांच की मांग रखी है।
चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों का मुद्दा
विवाद का एक अहम हिस्सा चुनाव आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों से जुड़ी रिपोर्ट है। CJP ने भारतीय एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा करीब 10 महीनों के दौरान कई फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात कही गई थी। रिपोर्ट के अनुसार ऐसी आपत्तियां कम से कम 14 मौकों पर दर्ज हुई थीं। CJP का कहना है कि इन आपत्तियों, उन पर आयोग की प्रतिक्रिया और अंतिम फैसलों से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि आम लोग और स्वतंत्र पर्यवेक्षक पूरे मामले को समझ सकें। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन घटनाओं को आंतरिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों की व्याख्या को लेकर अलग रुख रखा है। आयोग ने यह भी कहा है कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। इसलिए इस मामले में रिपोर्ट में सामने आए मतभेद और आयोग के आधिकारिक पक्ष दोनों को साथ देखना जरूरी है। किसी भी आरोप को अंतिम तथ्य मानने के बजाय उपलब्ध रिकॉर्ड और आधिकारिक जवाबों के आधार पर स्थिति समझना अधिक उचित होगा।
SIR और मतदाता सूची पर CJP की आपत्तियां
SIR को लेकर CJP ने कई स्तरों पर पारदर्शिता की मांग की है। संगठन ने ऑनलाइन Form 6 प्रक्रिया से जुड़े एक अतिरिक्त घोषणा प्रावधान पर भी सवाल उठाया। CJP के अनुसार नए मतदाताओं को अपने या माता-पिता की पिछली SIR मतदाता सूची में मौजूदगी से संबंधित जानकारी देनी पड़ रही थी और इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्तों की ओर से भी आपत्ति जताई गई थी। संगठन का कहना है कि ऐसी व्यवस्था पहली बार मतदान करने वाले नागरिकों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। इसके अलावा, CJP ने पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों, अपीलों और चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्यवाही के रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की है। संगठन केंद्रीयकृत चुनावी डेटा और उसके इस्तेमाल से जुड़े अधिकारों पर भी सवाल उठा रहा है। इन मुद्दों का अंतिम आकलन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण और न्यायिक प्रक्रिया से होने की स्थिति में अधिक स्पष्ट हो सकता है। फिलहाल CJP इन सवालों को लेकर सार्वजनिक अभियान चला रहा है और आयोग से विस्तृत जवाब की मांग कर रहा है।
CJP की अन्य मांगें भी सामने आईं
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा CJP ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर कई अन्य मांगें भी रखी हैं। संगठन ने SIR के दौरान आगे होने वाली मतदाता सूची से जुड़ी कार्रवाई पर रोक लगाने और पुराने चुनावी रिकॉर्ड को आधार बनाकर पुनः सत्यापन की मांग की है। उसने संबंधित रिकॉर्ड को सुप्रीम कोर्ट या स्वतंत्र न्यायिक निगरानी वाली जांच के सामने रखने की बात भी कही है। इसके साथ ही संगठन ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून में बदलाव की मांग उठाई है। CJP का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में व्यापक संस्थागत और नागरिक भागीदारी होनी चाहिए। इन मांगों के बीच आगामी चुनावों को लेकर भी संगठन ने प्रक्रिया पर रोक की मांग रखी है। दूसरी ओर, इन मांगों का लागू होना केवल किसी एक संगठन के बयान से तय नहीं होता, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया कानून, संवैधानिक प्रावधान और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से संचालित होती है। इसलिए आगे की स्थिति पर संसद, अदालतों, चुनाव आयोग और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं के कदम महत्वपूर्ण रहेंगे।
आगे क्या हो सकता है और क्यों है मामला महत्वपूर्ण
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 48 घंटे की समयसीमा के बाद CJP अपने घोषित कार्यक्रम को किस रूप में आगे बढ़ाता है। संगठन ने देशव्यापी आंदोलन और दिल्ली में अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी दी है। उसने “Election Commission Thik Karo” अभियान शुरू करने की भी घोषणा की है। इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि मतदाता सूची में नामों का सही होना सीधे नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ा विषय है। साथ ही, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी निर्णय प्रक्रिया पर सार्वजनिक भरोसा चुनाव व्यवस्था का अहम हिस्सा है। मौजूदा विवाद में CJP के आरोप, चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष और उपलब्ध दस्तावेज तीनों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने अपने निर्णयों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है, जबकि CJP संबंधित आपत्ति नोट और जवाब सार्वजनिक करने की मांग कर रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में सार्वजनिक रिकॉर्ड, न्यायिक हस्तक्षेप और आयोग की ओर से दिए जाने वाले स्पष्टीकरण इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। पाठकों के लिए इस विषय पर आगे की खबरों में दावों और सत्यापित तथ्यों के बीच अंतर समझना जरूरी रहेगा।