नागपुर/महाराष्ट्र: आदिवासी बच्चों की शिक्षा, स्कूलों की आधारभूत सुविधाओं और शिक्षकों की कमी को लेकर ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया गया है। अभियान के तहत आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों की स्थिति, एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों की व्यवस्था और शिक्षा में आदिवासी छात्रों की भागीदारी जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
अभियान से जुड़े अभिजीत दीपके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि देश को आजाद हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं, लेकिन कई आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों को अभी भी पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाएं और बुनियादी संसाधन नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए किसी एक सरकार को जिम्मेदार ठहराने के बजाय पिछले कई दशकों की अलग-अलग सरकारों पर सवाल उठाए।

720 एकलव्य स्कूलों में 477 के फंक्शनल होने का दावा
प्रेस कॉन्फ्रेंस में एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों को लेकर दावा किया गया कि 720 स्वीकृत स्कूलों में केवल 477 स्कूल ही फंक्शनल हैं। साथ ही बताया गया कि करीब 341 स्कूलों के पास स्थायी भवन हैं और बड़ी संख्या में स्कूल किराये के परिसरों में संचालित हो रहे हैं। ये आंकड़े अभियान के आयोजकों द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं।
सरकारी रिकॉर्ड में भी EMRS की संख्या और संचालन को लेकर अलग-अलग समय पर अलग आंकड़े सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, संसद में दिए गए एक आधिकारिक जवाब में 715 स्वीकृत EMRS में 476 के फंक्शनल होने की जानकारी दी गई थी। इसलिए इन आंकड़ों की तारीख और परिभाषा को ध्यान में रखना जरूरी है।
28 हजार से ज्यादा पद खाली होने का दावा
दीपके ने यह भी दावा किया कि आदिवासी शिक्षा व्यवस्था में 28 हजार से अधिक पद खाली हैं। उनका कहना था कि एक तरफ देश में रोजगार को लेकर चिंता है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी पदों का खाली रहना भी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।
शिक्षा में नामांकन का अंतर
अभियान में आदिवासी छात्रों के स्कूल और उच्च शिक्षा में नामांकन को लेकर भी सवाल उठाए गए। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, प्रेस कॉन्फ्रेंस में ST छात्रों के लिए उच्च-माध्यमिक स्तर पर लगभग 51.9% Gross Enrolment Ratio और उच्च शिक्षा में 22.8% का आंकड़ा बताया गया, जबकि राष्ट्रीय आंकड़े क्रमशः लगभग 58.4% और 30% बताए गए।
IIT में ST छात्रों के दाखिले पर भी सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस में IIT में ST छात्रों के दाखिलों को लेकर भी सवाल उठाए गए। दीपके ने दावा किया कि केवल करीब 130–137 ST आवेदकों को IIT में प्रवेश मिला और कुछ IIT में ST छात्रों के दाखिले का आंकड़ा शून्य रहा। इन आंकड़ों को उन्होंने आदिवासी छात्रों के लिए उच्च शिक्षा में मौजूद बाधाओं से जोड़ते हुए सवाल उठाया।
आदिवासी छात्रों की सुरक्षा और स्कूल सुविधाओं का मुद्दा
अभियान के दौरान आवासीय और आश्रम स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी चिंता जताई गई। दीपके ने महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों में आदिवासी छात्रों की मौतों का मुद्दा उठाया और स्कूलों की परिस्थितियों की जांच तथा जवाबदेही की मांग की। इन मौतों और उनके कारणों से जुड़े आंकड़े उनके द्वारा किए गए दावे हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में आवश्यक है।
अभियान का उद्देश्य क्या है?
अभियान से जुड़े लोगों के अनुसार इसका उद्देश्य किसी एक राजनीतिक दल या सरकार को निशाना बनाना नहीं, बल्कि आदिवासी बच्चों के लिए स्कूलों की स्थिति सुधारना है। अभियान में स्कूल भवन, शिक्षक, बुनियादी सुविधाएं, शिक्षा का बजट, छात्र सुरक्षा और उच्च शिक्षा तक पहुंच जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की मांग की जा रही है।
आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान की शुरुआत ऐसे समय में हुई है जब देश में आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। अब देखना होगा कि अभियान के तहत उठाए गए सवालों पर संबंधित सरकारें और प्रशासन क्या कदम उठाते हैं।