राजस्थान राजनीति: राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद अब मेयर, सभापति और चेयरमैन पदों के चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। 14 सितंबर को निकाय चुनावों की मतगणना के बाद कई शहरी निकायों में बोर्ड गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अब निर्वाचित पार्षदों के बीच स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण और पदों को लेकर चर्चाएं जारी हैं।
राज्य के निकाय चुनाव परिणामों में भाजपा ने 4,179 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 3,613 वार्डों में जीत मिली। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी 2,273 वार्डों में जीत हासिल की, जिसके कारण कई निकायों में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षद महत्वपूर्ण भूमिका में हैं।

निकाय चुनाव के बाद शुरू हुआ बोर्ड गठन का दौर
राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम आने के बाद अब अगला चरण मेयर, सभापति और अध्यक्ष के चुनाव का है। कई निकायों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण निर्वाचित पार्षदों के समर्थन को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हैं।
जयपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा जैसे नगर निगमों में भाजपा ने बहुमत हासिल किया है, जबकि बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस ने बहुमत प्राप्त किया। कुछ अन्य निकायों में निर्दलीय पार्षदों की संख्या बोर्ड गठन के लिहाज से महत्वपूर्ण बनी हुई है।
निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण
इन चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में वार्डों में जीत हासिल की है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2,273 निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुए हैं। ऐसे में जिन नगर निकायों में भाजपा या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसी वजह से कई शहरों में मेयर और चेयरमैन पद के चुनाव से पहले पार्षदों के समर्थन को लेकर राजनीतिक गतिविधियां देखने को मिल रही हैं।
अशोक गहलोत ने लगाए आरोप
निकाय चुनाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा पर पार्षदों को अपने पक्ष में करने के लिए पैसे और राजनीतिक दबाव के इस्तेमाल का आरोप लगाया है।
गहलोत ने दावा किया कि कुछ पार्षदों को बड़ी रकम की पेशकश की जा रही है और सरकार से जुड़े लोग इस प्रक्रिया में भूमिका निभा रहे हैं। ये गहलोत द्वारा लगाए गए आरोप हैं और इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया है।
भाजपा ने आरोपों को किया खारिज
गहलोत के आरोपों पर भाजपा की ओर से इन दावों को खारिज किया गया है। ऐसे में निकाय चुनाव के बाद सामने आए आरोपों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच आने वाले दिनों में मेयर और चेयरमैन चुनाव की प्रक्रिया पर नजर बनी रहेगी।
राजनीतिक दलों के अलावा स्थानीय स्तर पर निर्वाचित पार्षदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि बोर्ड गठन और पदाधिकारियों के चुनाव की प्रक्रिया उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ेगी।
जयपुर के री-पोलिंग नतीजों से भी बदली स्थिति
जयपुर समेत कुछ नगर निकायों में तकनीकी समस्याओं के कारण कुछ वार्डों में दोबारा मतदान कराया गया था। 17 सितंबर को आए री-पोलिंग परिणामों में कांग्रेस ने नौ में से छह वार्ड जीते, जबकि भाजपा को तीन वार्ड मिले।
जयपुर के चार री-पोलिंग वार्डों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जिससे नगर निगम के अंतिम राजनीतिक आंकड़ों में बदलाव हुआ।
राजस्थान की राजनीति में निकाय चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं?
नगर निकाय चुनाव स्थानीय स्तर की राजनीति और प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इनके जरिए शहरों में पार्षद चुने जाते हैं और बाद में मेयर, सभापति या अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया पूरी होती है।
नगर निगम और नगर निकायों के माध्यम से सफाई, सड़क, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट, पार्क, स्थानीय विकास और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े काम संचालित होते हैं। इसलिए नए बोर्ड के गठन के बाद शहरों में स्थानीय प्रशासन और विकास कार्यों पर नजर रहेगी।
आगे क्या होगा?
अब राजस्थान में कई नगर निकायों में बोर्ड गठन और मेयर, सभापति तथा अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। जिन निकायों में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला है, वहां प्रक्रिया अपेक्षाकृत सीधी हो सकती है। वहीं जिन स्थानों पर निर्दलीय या अन्य दलों के पार्षद निर्णायक संख्या में हैं, वहां समर्थन और बोर्ड गठन से जुड़ी गतिविधियां महत्वपूर्ण रहेंगी।
इसके साथ ही राजस्थान की राजनीति में निकाय चुनाव के परिणामों को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों की ओर से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। आने वाले दिनों में स्थानीय निकायों के पदाधिकारियों के चुनाव के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष
राजस्थान राजनीति में इन दिनों नगर निकाय चुनाव के बाद बोर्ड गठन और मेयर-चेयरमैन चुनाव प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। उपलब्ध परिणामों के अनुसार भाजपा ने 4,179 और कांग्रेस ने 3,613 वार्ड जीते हैं, जबकि निर्दलीयों ने 2,273 वार्डों में जीत दर्ज की है।
अब कई शहरी निकायों में निर्वाचित पार्षदों के बीच बोर्ड गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इसी बीच अशोक गहलोत द्वारा लगाए गए आरोपों और भाजपा की प्रतिक्रिया के कारण राज्य की राजनीतिक गतिविधियां भी चर्चा में हैं। मेयर और अन्य स्थानीय पदों के चुनाव के बाद राजस्थान के अलग-अलग नगर निकायों की तस्वीर और स्पष्ट होगी।