दो दिन पहले हमने 6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के जंतर मंतर पर हुए ऐतिहासिक प्रदर्शन की कहानी लिखी थी। उस प्रदर्शन में युवा सड़कों पर उतरे थे और अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। लेकिन उसके ठीक एक दिन बाद यानी 7 जून को राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक और बड़ी खबर आई, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) ने जगतपुरा इलाके में एक बड़ा अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया, जिसमें 44 साल पुरानी नूरानी मस्जिद को गिरा दिया गया। इस घटना ने सिर्फ जयपुर ही नहीं, पूरे राजस्थान की सियासत और सड़कों को गर्म कर दिया है। और इससे पहले ही प्रशासन ने इंटरनेट बंद कर दिया था, ताकि कोई अफवाह न फैले। आइए आपको इस पूरे मामले की जमीनी हकीकत बताते हैं।

जेडीए का बुलडोजर और नूरानी मस्जिद की 44 साल की इतिहास
जेडीए ने 7 जून को एक बड़ा ऑपरेशन चलाया। असल में प्रशासन जगतपुरा इलाके में नंदपुरी अंडरपास के पास एक सड़क को चौड़ा कर रहा है, जो रेलवे लाइन के समानांतर चलती है। ये सड़क फिलहाल सिर्फ 25 से 30 फीट चौड़ी है, लेकिन इसे 80 फीट चौड़ा करने का प्लान है। इसके लिए जो भी जगह आड़े आ रही थी, उसे हटाया जाना था। इसी कड़ी में नूरानी मस्जिद का नंबर भी आया। मस्जिद 1981 में बनी थी और इसे बनाने के लिए आसपास के मुस्लिम समुदाय ने चंदा इकट्ठा किया था मस्जिद का जमीन 1981 में खरीदी गई थी और 1988 में इसे राजस्थान वक्फ बोर्ड के साथ पंजीकृत भी किया गया था मस्जिद कमेटी का दावा है कि 1994 में उन्होंने जेडीए को डेवलपमेंट चार्जेज भी चुकाए थे। यानी ये कोई नई बनी झुग्गी नहीं थी, बल्कि चार दशक से ज्यादा पुरानी धार्मिक जगह थी, जहाँ रोज नमाज होती थी।
3000 पुलिस और इंटरनेट बंद: क्या थी तैयारी?
जब जेडीए ने अपने इस अभियान का ऐलान किया, तो प्रशासन ने कोई जोखिम नहीं लिया। सबसे पहले तो 7 जून की मध्यरात्नि से ही जयपुर नॉर्थ और जयपुर ईस्ट पुलिस जिलों में मोबाइल इंटरनेट पूरी तरह बंद कर दिया गया। ये बंद 8 जून की मध्यरात्नि तक जारी रहा। सिर्फ वॉइस कॉल चलती रहीं। इसके अलावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे व्हाट्सएप, फेसबुक और एक्स पर भी पाबंदी लगा दी गई। वजह क्या थी? प्रशासन का कहना था कि कहीं ऐसा न हो कि इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर कोई भड़काऊ या झूठा वीडियो वायरल हो जाए, जिससे कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाए। सिर्फ इतना ही नहीं, करीब 3000 पुलिसकर्मियों और RAF (रैपिड एक्शन फोर्स) की यूनिट्स को तैनात कर दिया गया। धारा 163 (पुरानी धारा 144) लगा दी गई, जिसमें पांच से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी थी। यानी प्रशासन ने ‘पहले तो तलवार निकाल ली, फिर बात करने का मौका दिया’ वाला रवैया अपनाया।
सिर्फ मस्जिद नहीं, पांच धार्मिक स्थलों पर गिरा बुलडोजर
इस पूरे विवाद में ये समझना जरूरी है कि अकेले मस्जिद ही निशाने पर नहीं थी। जेडीए की जिस लिस्ट में मस्जिद का नाम था, उसमें दो मंदिर, एक मजार और एक सत्संग भवन का भी नाम था। यानी प्रशासन का तर्क ये है कि ये सड़क चौड़ीकरण की वजह से हटाया जा रहा है, न कि किसी एक समुदाय को निशाना बनाकर। लेकिन सवाल ये है कि जब 22 मई को भी यहां पर 134 अतिक्रमण हटाए गए थे, तो धार्मिक स्थलों को छोड़ क्यों दिया गया था? प्रशासन का कहना है कि उन्हें खुद हटाने का समय दिया गया था, और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो कार्रवाई की गई। Meta’s plan यानी प्रशासन की इस प्लानिंग में न तो किसी तरह की नरमी दिखी और न ही किसी तरह की कोताही। एक साथ सुरक्षा के कड़े इंतजाम और इंटरनेट बंद ने ये साफ कर दिया कि प्रशासन किसी भी कीमत पर ये ऑपरेशन पूरा करना चाहता था, भले ही उसके लिए लोगों की आवाज (सोशल मीडिया) को बंद ही क्यों न करना पड़े।
वक्फ बोर्ड और कांग्रेस ने उठाए सवाल, क्या होगा आगे?
जैसे ही बुलडोजर ने काम करना खत्म किया, वैसे ही सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई। राजस्थान वक्फ बोर्ड ने इस कार्रवाई को गैर-कानूनी बताया है, क्योंकि मस्जिद उनके पास रजिस्टर्ड थी और उनका कहना है कि बिना पर्याप्त नोटिस के ये कार्रवाई हुई है। कांग्रेस के विधायक रफीक खान, जो उस इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं, पहले से ही इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना है कि ये जमीन खरीदी गई थी और इस पर गैर-कानूनी कब्जा नहीं था। विपक्ष ने सरकार पर हड़बड़ी में कार्रवाई करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया है। अब सबसे बड़ी मांग ये उठ रही है कि इस पूरे मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए, ताकि ये साफ हो सके कि आखिर प्रशासन ने किस आधार पर और कितनी जल्दबाजी में ये फैसला लिया।
जयपुर का माहौल और कॉकरोच जनता पार्टी का सन्नाटा
अब सबसे दिलचस्प सवाल ये है कि 6 जून को जंतर मंतर पर दिल्ली की सड़कों पर उतरने वाली कॉकरोच जनता पार्टी इस पूरे मामले में कहाँ है? दरअसल, सीजेपी का मुख्य एजेंडा परीक्षाओं में गड़बड़ी और बेरोजगारी के खिलाफ है। उन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग एक नया प्रयोग किया था। लेकिन जयपुर का मामला अलग है। यहाँ इंटरनेट बंद है, सोशल मीडिया का एक्सेस नहीं है, और जयपुर के अंदर का माहौल बेहद तनावपूर्ण है। सीजेपी एक डिजिटल आंदोलन है। जब डिजिटल ही बंद हो जाए, तो उनकी पहुंच खत्म हो जाती है। ये घटना हमें बताती है कि आज के समय में इंटरनेट बंद करना किसी भी जनआंदोलन को पंगु बनाने का सबसे बड़ा हथियार है। फिलहाल जयपुर में तनाव बना हुआ है। प्रशासन ने स्कूल बंद कर दिए हैं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। देखना ये होगा कि क्या ये घटना सीजेपी जैसे युवा आंदोलनों के लिए एक नया मुद्दा बनेगी, या फिर वो चुप रहेंगे।